Tuesday, December 4, 2018

सबसे ज्यादा इंटरनेट भी भारतीय ही करेंगे इस्तेमाल

भारत में 2022 तक स्मार्टफोन यूजर्स की संख्या 82.9 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है जो 2017 तक करीब 40 करोड़ है। इस बात की जानकारी सिस्को ने अपनी 'विजुअल नेटवर्किंग इंडेक्स' रिपोर्ट मे दी है। सिस्को की रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 में स्मार्टफोन पर इंटरनेट ट्रैफिक 17% है जो 2022 तक बढ़कर 44% पहुंचने की उम्मीद है। वहीं कम्प्यूटर पर इंटरनेट ट्रैफिक कम होकर सिर्फ 19% पर आ जाएगा।

सबसे ज्यादा इंटरनेट यूजर्स भारत में होंगे : सिस्को की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के सबसे ज्यादा स्मार्टफोन यूजर्स भारत में होंगे। 2017 तक भारत में 35.7 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं जो पूरी दुनिया की सिर्फ 27% आबादी है। लेकिन 2022 तक भारत में इंटरनेट यूजर्स की संख्या 84 करोड़ से ज्यादा होगी, जिसका मतलब हुआ कि दुनियाभर के 60% इंटरनेट यूजर्स भारतीय ही होंगे।

मोबाइल इंटरनेट की स्पीड भी बढ़ेगी : रिपोर्ट के मुताबिक, दुनियाभर में अगले 4 साल में मोबाइल इंटरनेट की स्पीड दोगुनी होने का अनुमान है।  अभी दुनिया में एवरेज इंटरनेट स्पीड 13.2Mbps है जो 2022 तक बढ़कर 285Mbps हो जाएगी। सबसे ज्यादा इंटरनेट स्पीड वेस्टर्न यूरोप में बढ़ेगी और वहां 2022 तक 50.5Mbps पहुंचने का अनुमान है।

ब्रॉडबैंड और वाई-फाई स्पीड भी दोगुनी होगी : वहीं ग्लोबल फिक्स्ड ब्रॉडबैंड की स्पीड भी 39.4Mbps (2017) से बढ़कर 2022 तक 75.4Mbps हो जाएगी। जबकि वाई-फाई कनेक्शन की भी ग्लोबल स्पीड 24.4Mbps (2017) से बढ़कर 54Mbps तक पहुंचने का अनुमान है।

आजकल इंटरनेट सबसे बड़ी जरुरत बन गया है, लेकिन 69 फीसदी पाकिस्तानियों को ये ही नहीं पता कि इंटरनेट क्या होता है? इस बात का खुलासा इंटरनेशनल कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी (आईसीटी) की श्रीलंका में स्थित रिसर्च फर्म LirenAsia ने अपने सर्वे में किया है। इस सर्वे में पता चला कि पाकिस्तान की 15-65 वर्ष की आयु की 69% आबादी को इंटरनेट के बारे में पता ही नहीं है जबकि 3% आबादी इंटरनेट इस्तेमाल करने के तरीके के बारे में नहीं जानती।

18 देशों को शामिल किया था इस सर्वे में : LirenAsia ने इस सर्वे में 18 देशों के 38 हजार से ज्यादा लोगों को शामिल किया था। इस सर्वे में सिर्फ 15-65 की उम्र के लोगों को शामिल किया गया था। रिसर्च फर्म के मुताबिक, अक्टूबर-दिसंबर 2017 के बीच किए गए इस सर्वे में भारत के 5 हजार और पाकिस्तान-बांग्लादेश के 2 हजार से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया था।

Monday, November 12, 2018

क्या शिवराज सिंह चौहान मुसलमानों के भी मामा हैं?

नेताओं का भाइयों और बहनों कहकर संबोधित करना आम बात है, लेकिन भांजे और भांजियों से संबोधन केवल मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान करते हैं. शिवराज सिंह का कहना है कि मध्य प्रदेश के लोग उन्हें मामा अपनापन के भाव से कहते हैं.

भारत की चुनावी राजनीति में जब धर्म, जाति और क्षेत्र के नाम पर लामबंदी अहम घटना बन गई हो ऐसे में शिवराज सिंह चौहान की मामा की छवि क्या इन सरहदों से परे है?

दिन के ग्यारह बज रहे हैं और भोपाल के सैफ़िया कॉलेज के कैंपस में एक साथ कई लड़कियां बुर्क़े में बैठी हैं. 28 नवंबर को मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होने वाला है.

मतदान और प्रदेश की राजनीति पर बात करने की कोशिश की तो ज़्यादातर लड़कियों ने दिलचस्पी नहीं दिखाई. आख़िरकार टीचर्स की मदद से कुछ लड़कियां तैयार हुईं.

आयशा इन्हीं में से एक हैं. आयशा से सवाल किया कि क्या शिवराज सिंह चौहान मुसलमानों के भी मामा हैं? उनका जवाब था,''हां, जी उन्होंने हमारे प्रदेश के लिए बहुत कुछ किया है और ग़रीबों पर भी ध्यान दिया है. उनकी कई योजनाओं से लोगों को फ़ायदा मिला. उनकी छवि अच्छी है.''

आयशा के बगल में ही खड़ी शाज़िया बिल्कुल अलग राय रखती हैं. वो कहती हैं, ''शिवराज सिंह चौहान ने घोषणाएं बहुत कीं लेकिन काम उस तरह से नहीं हुआ है. इधर के सालों में हिन्दू-मुसलमानों में खाई बढ़ाने की कोशिश की गई है. ये देश के लिए ठीक नहीं है.''

सैफ़िया कॉलेज में शिवराज सिंह चौहान को लेकर लोगों की राय बँटी दिखी.

साजिद अली भोपाल के जाने-माने वक़ील हैं और कांग्रेस के पदाधिकारी भी हैं. मुसलमानों के बीच शिवराज सिंह चौहान की छवि को लेकर वो कहते हैं, ''इनके ख़िलाफ़ कोई ख़ास नाराज़गी नहीं है. कुछेक चीज़ें हैं जिनसे मुसलमानों में इन पर भी संदेह बढ़ा. 31 अक्टूबर 2016 को भोपाल में पुलिस ने एनकाउंटर के नाम पर आठ लोगों को मार डाला. बिना किसी पुख्ता जांच के इन आठों को सिमी का सदस्य बता दिया गया और एक संदिग्ध एनकाउंटर को अंजाम देने वाले पुलिसकर्मियों को शिवराज सिंह ने पुरस्कृत किया. यह बिल्कुल ही नाइंसाफ़ी भरा रुख़ था.''

साजिद कहते हैं कि ऐसे ही मौक़ों पर दिग्विजय सिंह की कमी खलती हैं. वो कहते हैं, ''भले शिवराज सिंह चौहान व्यक्तिगत रूप से उदार हों लेकिन उनकी पार्टी की विचारधारा बाँटने वाली है और इसके ख़िलाफ़ वो नहीं जा सकते. दिग्विजय सिंह की धर्मनिरपेक्षता उनकी व्यक्तिगत पहचान है. अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में कहा जाता था कि सही आदमी ग़लत पार्टी में है. शिवराज सिंह चौहान को लेकर भी मुझे कमोबेश ऐसा ही लगता है.''